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मार्को रूबियो जामनगर क्यों गए? अमेरिका को रिलायंस रिफ़ाइनरी से चाहिए ये 3 चीज़ें

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने जामनगर में रिलायंस की रिफ़ाइनरी का दौरा किया। डीज़ल संकट, वेनेज़ुएला का भारी तेल और टेक्सस निवेश—जानिए अमेरिका की 3 वजहें और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का हाल।

मार्को रूबियो जामनगर रिलायंस रिफ़ाइनरी - अमेरिका की 3 वजहें

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बुधवार (21 अक्टूबर 2026) को गुजरात के जामनगर में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की तेलशोधनशाला (रिफ़ाइनरी) का दौरा किया। एक दिन पहले मुंबई में उन्होंने भारत को “तेलशोधन की महाशक्ति” बताया था। ईरान युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण दुनिया भर में ईंधन महंगा हो चुका है, और ऐसे वक़्त में अमेरिकी विदेश मंत्री का एक निजी रिफ़ाइनरी तक पहुँचना कई सवाल खड़े करता है—आख़िर अमेरिका को जामनगर से चाहिए क्या, और इसमें भारत का क्या फ़ायदा है?

वीडियो में देखिए: डीज़ल संकट में अमेरिका को भारत की रिफ़ाइनरी की ज़रूरत क्यों पड़ी?

रूबियो ने जामनगर के बारे में क्या कहा?

रूबियो के मुताबिक़ रिलायंस के पास भारी कच्चे तेल को शोधित करने की क्षमता है, और जैसे-जैसे वेनेज़ुएला का ज़्यादा तेल बाज़ार में आएगा, रिलायंस उसे शोधित कर सकती है। उनका तर्क था कि सिर्फ़ तेल निकाल लेना काफ़ी नहीं, उसे शोधित करने की क्षमता भी उतनी ही अहम है—और इस मामले में भारत के पास क्षमता भी है और कंपनियाँ भी। रिलायंस ने हाल ही में अमेरिका में भी तेलशोधन क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश किया है।

अमेरिका को जामनगर से क्या चाहिए? विशेषज्ञ की नज़र में 3 वजहें

बीबीसी हिंदी के पॉडकास्ट “दिनभर” में ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने रूबियो के इस दौरे के पीछे तीन बड़े कारण गिनाए।

1. दुनिया में डीज़ल की किल्लत

तनेजा के अनुसार अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता डीज़ल की आपूर्ति है, जो बुरी तरह बाधित हुई है। उनके मुताबिक़ अमेरिका में डीज़ल की क़ीमत प्रति लीटर के हिसाब से भारत के मुक़ाबले लगभग ढाई से तीन गुना तक पहुँच गई है। उन्हें लगता है कि अमेरिका को ईरान या यूक्रेन का मसला जल्द सुलझता नहीं दिख रहा, इसलिए वह अपनी अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के लिए डीज़ल की पक्की आपूर्ति चाहता है।

2. वेनेज़ुएला का “पत्थर जैसा” भारी तेल

वेनेज़ुएला में दुनिया के लगभग 20 फ़ीसदी तेल भंडार हैं, जहाँ शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल जैसी अमेरिकी कंपनियाँ अरबों डॉलर लगा रही हैं। लेकिन वहाँ का तेल बेहद भारी और मोम जैसा होता है, जिसे दुनिया की गिनी-चुनी रिफ़ाइनरियाँ ही कम लागत पर पेट्रोल-डीज़ल में बदल सकती हैं। तनेजा का अनुमान है कि अमेरिका ऐसा समझौता चाहता है जिसमें रिलायंस वेनेज़ुएला का तेल ले, उसे शोधित करे और बड़ी मात्रा में अमेरिका को निर्यात करे। गौरतलब है कि रिलायंस पारंपरिक रूप से वेनेज़ुएला से तेल ख़रीदती रही है और अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद उसने यह ख़रीद बंद की थी।

3. टेक्सस की रिफ़ाइनरी और अमेरिकी चुनाव

रिलायंस ने टेक्सस में रिफ़ाइनरी लगाने की घोषणा की है—तनेजा के मुताबिक़ अमेरिका में 50 साल बाद इतनी बड़ी रिफ़ाइनरी बनेगी। टेक्सस में ख़ासकर सीनेट को लेकर कड़ा चुनावी मुक़ाबला है, इसलिए उनके अनुसार अमेरिकी नेतृत्व चाहता है कि इस निवेश से होने वाले रोज़गार और आर्थिक फ़ायदे की चर्चा ज़्यादा से ज़्यादा हो।

अमेरिका ख़ुद यह तेल शोधित क्यों नहीं कर लेता?

तनेजा बताते हैं कि अमेरिका में दशकों से कोई नई रिफ़ाइनरी नहीं बनी और पश्चिमी यूरोप में तो कई रिफ़ाइनरियाँ बंद कर दी गई हैं, क्योंकि वहाँ लोग अपने शहरों के पास नई रिफ़ाइनरी लगाने की इजाज़त नहीं देते। नई रिफ़ाइनरी बनाने में 5-6 साल लगते हैं और तकनीक व निवेश दोनों भारी होते हैं। इसीलिए नई और आधुनिक रिफ़ाइनरियाँ ज़्यादातर एशिया—कोरिया, जापान, चीन और भारत—में बनी हैं। भारत की 23 से ज़्यादा रिफ़ाइनरियों में से लगभग छह दुनिया की सबसे आधुनिक रिफ़ाइनरियों में गिनी जाती हैं, और रिलायंस उन चुनिंदा रिफ़ाइनरियों में है जो वेनेज़ुएला का भारी तेल अच्छे तरीक़े से शोधित कर पाती हैं।

इसमें भारत का क्या फ़ायदा है?

तनेजा की राय में अगर तेल जैसी रणनीतिक चीज़ के लिए अमेरिका की भारत पर निर्भरता बढ़ती है—चाहे रिफ़ाइनरी के ज़रिए या अमेरिका, वेनेज़ुएला और भारत के बीच किसी त्रिपक्षीय समझौते से—तो यह भारत के लिए अच्छा है। ज़रूरत पड़ने पर भारत इस स्थिति का लाभ उठा सकता है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: ट्रंप बोले “बिल्कुल अलग होगा”

रूबियो ने कहा कि विदेश विभाग व्यापार समझौतों पर बातचीत नहीं करता, लेकिन दोनों देश समझौते के उतने ही क़रीब हैं “जितना बिना हस्ताक्षर के हुआ जा सकता है”। उधर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में कहा कि भारत के साथ होने वाला समझौता पहले के समझौतों से बिल्कुल अलग तरह का होगा।

व्यापार विशेषज्ञ अजय श्रीवास्तव इससे सहमत नहीं दिखते कि तेल को व्यापार समझौते का हिस्सा बनाया जाए। उनका कहना है कि कच्चा तेल एक आम वस्तु है—भारत जहाँ से सस्ता मिलेगा वहाँ से ख़रीदेगा और शोधित उत्पाद दुनिया में कहीं भी बेच सकता है। वे याद दिलाते हैं कि 2010 से 2020 के बीच भारत ने वेनेज़ुएला में भारी निवेश किया था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ओएनजीसी और रिलायंस समेत कई कंपनियों का पैसा डूब गया। उनके मुताबिक़ आज अमेरिका जो कह रहा है, कल उसकी नीति क्या होगी, कोई नहीं जानता।

समझौते में देरी क्यों?

श्रीवास्तव के अनुसार 6 फ़रवरी को जारी भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में अमेरिका ने पारस्परिक शुल्क 25% से घटाकर 18% करने की बात कही थी, लेकिन दो हफ़्ते बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पारस्परिक शुल्क को ही अवैध ठहरा दिया। तब से, उनके मुताबिक़, अमेरिका यह नहीं बता पाया है कि वह भारत को शुल्क पर क्या प्रस्ताव दे रहा है। उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि अमेरिका भेजी जाने वाली कमीज़ पर अभी क़रीब 12% सामान्य शुल्क और 10% अतिरिक्त शुल्क मिलाकर लगभग 22% शुल्क लग रहा है, और यह साफ़ नहीं कि समझौते के बाद यह कम होगा या आगे बढ़ नहीं जाएगा।

श्रीवास्तव को विदेश नीति पर भी असर दिखता है। उनके अनुसार संयुक्त बयान में भारत के अमेरिका की आर्थिक और सुरक्षा नीति से तालमेल बिठाने की बात है, जिसका मतलब यह हो सकता है कि समझौते के बाद भारत रूस से तेल ख़रीद जारी नहीं रख पाएगा। उनका कहना है कि दोनों सरकारों ने 6 फ़रवरी के बाद की प्रगति के बारे में कोई ब्योरा साझा नहीं किया है—अब तक सिर्फ़ बयानबाज़ी है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मार्को रूबियो जामनगर क्यों गए?

रूबियो ने रिलायंस की जामनगर रिफ़ाइनरी का दौरा किया, जो भारी कच्चे तेल—ख़ासकर वेनेज़ुएला के तेल—को शोधित कर सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक़ अमेरिका डीज़ल की किल्लत के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा पक्की करना चाहता है।

जामनगर रिफ़ाइनरी ख़ास क्यों है?

यह रूस और वेनेज़ुएला समेत कई देशों का कच्चा तेल शोधित करती है और दुनिया की गिनी-चुनी आधुनिक रिफ़ाइनरियों में है जो बेहद भारी तेल को कम लागत पर पेट्रोल-डीज़ल में बदल सकती है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कब होगा?

अभी कोई तारीख़ नहीं है। रूबियो और ट्रंप दोनों कह रहे हैं कि समझौता बहुत क़रीब है, लेकिन दोनों सरकारों ने इसकी शर्तों का ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है।


यह विश्लेषण बीबीसी हिंदी के पॉडकास्ट “दिनभर” (21 अक्टूबर 2026) में ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा और व्यापार विशेषज्ञ अजय श्रीवास्तव के साथ हुई चर्चा पर आधारित है। पूरी चर्चा के लिए देखें बीबीसी हिंदी। हिंदी में ताज़ा ख़बरों के लिए सब्सक्राइब करें South Asian Report यूट्यूब चैनल।

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